सिमट गई है नूर की चादर
सिमट गई है नूर की चादर जाने कैसी घड़ी है आई सांसे उखड़ रही है जैसे ढूंढ रही अपनी परछाईं कोना कोना है अब सूना बूंद बूंद जीवन है सहमा अपनों में है घुली ये दहशत भारी विपदा है यह भाई ढके ,छुपे न मिले किसी से सभी कहे यही बात सभी से अंदर चीख रही खामोशी सांसों की यही डोर बताई सूरज,चांद सब एक हो गए आस के दीपक कहां खो गए? अब तो उन चौखट पे ताले दीख रही है बस तन्हाई पल पल समय रेत हुआ है पानी में तिनका डूबा है आफत में है जान यहां पर कब होगी कोरोना की विदाई टूट गए सांसों के सरगम बिखरे पुष्पगंध,बीते बसंत दिक दिगंत में है भय अनंत चहुं ओर चीख रही तरुनाई सांझ ओढ़ दिन ढल जाता है श्याम सा चादर खल जाता है रात में गिरती है जब बिजली धुंध में खो जाती शहनाई किसके नाम करूं मै क्या? किसकी गलती पर कहूं मै क्या? कैसा विकट प्रलय दृश्य यह जाने कैसी मुश्किल घड़ी आई ________________ अंकेश कुमार संक्षिप्त परिचय - अंकेश कुमार एम. एस सी.,एम.ए.,बी.एड. (पटना विश्वविद्यालय) प्रधानाध्यापक गवर्नमेंट स्कूल (लोहियानगर),कंकरबाग पटना(बिहार) रचना : पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशि...