वो बचपन की यादें

वो बचपन की यादें सताती बहुत है 
रुलाती बहुत है, हँसाती बहुत है,
कभी रूठ जाना कभी मान जाना 
वो झूठे नखरे वो झूठा बहाना,

सताती बहुत है,रुलाती बहुत है,,,,,

पकड़ माँ की उँगली वो आँगन में चलना 
दादी का चश्मा पहन कर मचलना
वो दादा की कांधे की प्यारी सवारी 
वो मिट्टी की महले वो लकड़ी की गाड़ी ।।
 
सताती बहुत है,रुलाती बहुत है,,,,,

सज-धज के हर रोज स्कूल जाना 
तोतलाते स्वर में कविता सुनाना
छुट्टी में बागो से अमरूद चुराना
पकड़े गये तो फिर से बहाना।।

सताती बहुत है,रुलाती बहुत है,,,,,

कभी नीम बरगद पे झूले लगाना
कभी मिट्टीयों से खिलौने बनाना 
कभी ईट पत्थर से महले बनाना
कभी कागजो से वो कश्ती बनाना 

सताती बहुत है,रुलाती बहुत है,,,,,

  •               सरफराज अहमद  (हिंदुस्तानी)

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