अनुभूति
अनुभूति
यहां क्षण क्षण अंधे होते हैं।
पल भर में आंखें खुलती है।
पीड़ा का दाब व ताप अकल,
आहें भी जी सुलगाती हैं।
किसका औचित्य? है कौन उचित?
पग पग यह प्रश्न उभरता है।
जानते हैं सच सभी,
पर क्या वो सच कह देते हैं
विकल प्राण की मनुज ठान
पत्थर पर सब सह लेते हैं।
पत्थर पर सब सह लेते हैं।
___________अंकेश कुमार

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