निःशब्द-एक मार्मिक कविता
निशब्द.
दूसरे को कष्ट ,भय असुरक्षा देता है जो आदमी
तभी कहता हूं आदमी में जन्म लेनेवाला नही होता है आदमी
जितने कष्ट,भयंकर कहर बन जिस पर भी टूट पड़ेगा आदमी
कहना न होगा उस पीड़ा से खुद भी गुजरेगा आदमी
देख अट्टहास कर रही प्रकृति तुझ पर
तेरे लिए बंद पड़ी है प्रार्थनाएं
ले रही प्रकृति तुझसे तेरा हिसाब
जितने जाने ,अनजाने,
जुबा,बेजुबाँ को
दी है तुमने यातनाएं.
काल की गति कभी नही चलती बेहिसाब
कुदरती न्याय है इतना नायाब
मुश्किल घड़ी अब तुम्हारी है
जिदगी तुम पर भारी है
सूरज जलाएगा तुझको
पानी डुबोयेगा तुझको
ठंढ में ठिठरोगे तुम
यहीं इस धरती पर बिखरोगे तुम


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
Thanks for supporting lovebihar